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स्त्री अउर सिंगार

                
                                                         
                            स्त्री अउर सिंगार
                                                                 
                            
भोरहीं से अइना आगे,
बैठल बाड़ी घरवाली,
एतना क्रीम-पाउडर पोतली,
लागे नईखे अब ऊ खाली।

कंघी, क्लिप अउर लाली-पाली,
सबके चलत दरबार,
देख के पतिदेव सोचत रहलें — “ई मेकअप ह कि हथियार?”

काजर अइसन खींचत बाड़ी,
जइसे खेत के मेड़,
लिपिस्टिक के लालिमा देखीं,
लाज से सुर्ख भइल भोर-भिनसार।

बोली — “ए जी, दूरहीं रहीं, साड़ी में पिन लगावतानी।”
पति बेचारा भूखल पेटे,
रोटी के सपना सजावतानी।
एक साड़ी प पसंद ना आवे,
दूसरियो लागे फीकी,
तीसर चुनते-चुनते हो गइल
दुपहरिया पूरा सींकी।

बिंदी खातिर आधा घंटा,
चूड़ी खातिर दू घंटा,
पति कहे — “अब चलब कि नाहीं?”
बोली — “बस एगो मिनटवा!”

ई “एगो मिनट” अइसन होला,
जइसे सरकार के काम,
सुरू जल्दी हो जाला
बाकिर खतम होखे में लागे शाम।

जब पूरा सज-धज के निकलीं,
लागे बिजली चमक गइल, गली-मोहल्ला सब ताके,
जइसे मेला दमक गइल।
पति धीरे से कान में पूछलें — “का जरूरत रहे एतना?”
पत्नी बोली — “औरत हईं जी, सिंगार बिना लागे सूना!”
तबसे पतिदेव समझ गइलें,
ई दुनिया के सार — औरतन के हँसी बचावे खातिर जरूरी बा सिंगार!
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3 महीने पहले

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