सितम सहे जो, लबों को सीकर, वो मुस्कुराए, वफ़ा यही है।
किसी की ख़ातिर, ख़ुद अपने दिल को, मिटा ही देना, सज़ा यही है।
दिए हैं जितने, ग़म उसने मुझको, मैं ख़ुश हूँ उन पर, अता यही है।
शिकायतों को, ज़ुबाँ देने से, बाज़ रहना, रज़ा यही है।
फ़ना के रस्ते, पे चल पड़ो तो, तुम्हें मिलेगी, बक़ा यही है।
कठिन बहुत है, जुनूँ की मंज़िल, मगर हक़ीक़त, सदा यही है।
रहे सलामत, हमेशा ख़ुश वो, ये दिल से निकली, दुआ यही है।
नहीं है उससे, कोई भी शिकवा, बस एक हमारी, नदा यही है।
कोई जो पूछे, कि इश्क़ क्या है, तो मुस्कुराकर, जवाब देना।
ये दर्द पाना, ये अश्क पीना, क़सम ख़ुदा की, अदा यही है।
अँधेरी शब में, जो राही भटके, तो उसको रस्ता, दिखा के आना।
ख़ुलूस-ए-दिल से, दिए जलाना, कि तीरगी की, क़ज़ा यही है।
हम अपने दिल को, मना चुके हैं, कि अब न होंगे, उदास उससे।
मगर वो ज़ालिम, है जानता सब, हमारी उससे, ख़ता यही है।
पहाड़, वादी, चिनार, चश्मे, सभी ये मंज़र, हसीनतर हैं।
सुकून है लेकिन, तेरे ही पहलू, कि मेरे दिल की, फ़िज़ा यही है।
बताओ "फ़ैयाज़", तड़पते दिल की, ग़ज़ल है मरहम, दवा यही है।
क़लम उठाओ, कहो ये दुनिया, से दिल की धड़कन, सदा यही है।
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