आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सिंहासन से ऊँचा सत्य

                
                                                         
                            सिंहासन से ऊँचा सत्य
                                                                 
                            

मुकुट मिला था, राज मिला था,
मन अभिमान से दूर रहा।
दानवीर हरिश्चंद्र का जीवन,
सत्य-धर्म से भरपूर रहा।

सुख से ऊपर सत्य बिठाया,
वचन को जीवन-मंत्र बनाया।
सत्य रहा, विश्वास बचाया,
हरिश्चंद्र ने धर्म निभाया॥

ऋषि विश्वामित्र द्वार पधारे,
राज्य दान में माँग लिया।
राजा ने पल भर न सोचा,
अपना सब कुछ सौंप दिया।

राजपाट का मोह मिटाया,
हँसकर अपना शीश झुकाया।
सत्य रहा, विश्वास बचाया,
हरिश्चंद्र ने धर्म निभाया॥

राज गया, धन भी चला गया,
बाकी ऋषि की दक्षिणा थी।
कठिन घड़ी थी, राह कठिन थी,
फिर भी मन में दृढ़ता थी।

पत्नी-पुत्र का साथ छुड़ाया,
अपना तन भी बेच चुकाया।
सत्य रहा, विश्वास बचाया,
हरिश्चंद्र ने धर्म निभाया॥

हाथों से जो दान बाँटते,
वे हाथों से काम करें।
कल तक जिनके आगे दुनिया,
आज किसी के दास बनें।

भाग्य ने कैसा रंग दिखाया,
राजा को श्मशान पहुँचाया।
सत्य रहा, विश्वास बचाया,
हरिश्चंद्र ने धर्म निभाया॥

श्मशान खड़ा था मौन सामने,
राख उड़ाती तेज हवा।
हर शव से कर लेना उनका,
कठिन नियम था, कठिन सेवा।

आँसू पीकर फर्ज निभाया,
दुख को मन पर राज न आया।
सत्य रहा, विश्वास बचाया,
हरिश्चंद्र ने धर्म निभाया॥

वन में रोहित फूल चुन रहा,
नाग ने आकर डस लिया।
माँ तारामती टूट गई पर,
पुत्र को गोदी में रख लिया।

सूनी राहों पर पग धाया,
मृत बेटे को घाट पर लाया।
सत्य रहा, विश्वास बचाया,
हरिश्चंद्र ने धर्म निभाया॥

सामने पत्नी, गोद में बेटा,
दुख का कैसा वार हुआ।
राजा बोले—“शुल्क लगेगा,”
हृदय बहुत लाचार हुआ।

ममता रोई, हृदय भी रोया,
नियम मगर फिर भी निभाया।
सत्य रहा, विश्वास बचाया,
हरिश्चंद्र ने धर्म निभाया॥

वस्त्र बचा था आधा तन पर,
वही दक्षिणा बनकर मिला।
सत्य परीक्षा पूरी होते,
देव-कृपा का कमल खिला।

पुत्र फिर से मुसकाया,
राजा ने फिर राज्य भी पाया।
सत्य रहा, विश्वास बचाया,
हरिश्चंद्र ने धर्म निभाया॥

दान नहीं बस धन देना है,
स्वार्थ छोड़ना दान बड़ा।
वचन निभाना कठिन समय में,
मानव का सम्मान बड़ा।

जिसने अपना लोभ घटाया,
उसने सच्चा सुख भी पाया।
सत्य रहा, विश्वास बचाया,
हरिश्चंद्र ने धर्म निभाया॥

आज मुखौटे बिकते हर दिन,
सच का कम व्यापार हुआ।
झूठ सजाकर आगे निकला,
सच अक्सर लाचार हुआ।

फिर भी जिसने सच अपनाया,
उसने अपना मान बचाया।
सत्य रहा, विश्वास बचाया,
हरिश्चंद्र ने धर्म निभाया॥

घर हो, दफ्तर या हो बाजार,
सच को अपना मीत बनाओ।
लाभ मिले या हानि मिले पर,
कभी न झूठी राह अपनाओ।

सत्य भले कुछ देर से जीते,
अंत समय सम्मान दिलाए।
युग-युग ने यह सत्य बताया—
हरिश्चंद्र फिर याद में आए॥
— संतोष कुमार शर्मा
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर