सृष्टि की संचित पुकार थे राम
धरती पाप से बोझिल होकर,
ऋषियों की तप-धारा खोती थी।
रावण का उन्मत्त अहंकार,
मर्यादा हर दिन रोती थी।
देवों ने कर जोड़ पुकारा,
धर्म पुनः सँवारो तुम।
भक्तों का विश्वास डिगा था,
फिर उसका आधार बनो तुम।
जन-जन की पीड़ा बोल उठी,
वे अवतरण के आधार थे।
राम किसी एक हेतु न आए,
सृष्टि की संचित पुकार थे॥
दशरथ का वैभव अधूरा,
संतति-सुख का द्वार न था।
कौशल्या की सूनी गोदी,
ममता का संसार न था।
पुत्रकामेष्टि यज्ञ हुआ तो,
आशा का विस्तार हुआ।
चार रूप में कृपा उतरी,
अवधपुरी में प्यार हुआ।
सूनी गोदी, रुका हुआ कुल,
सब राम-जन्म के आधार थे।
राम किसी एक हेतु न आए,
सृष्टि की संचित पुकार थे॥
विश्वामित्र की यज्ञ-वेदियाँ,
रक्षा की गुहार करें।
ताड़का, मारीच, सुबाहु,
साधना पर वार करें।
राम चले तो तप निर्भय था,
यज्ञों को सम्मान मिला।
शिला बनी अहल्या जागी,
जीवन को वरदान मिला।
तप की रक्षा, शिला की मुक्ति,
दोनों करुणा के विस्तार थे।
राम किसी एक हेतु न आए,
सृष्टि की संचित पुकार थे॥
मिथिला को बस वीर न चाहा,
शीलवान बलवान मिले।
सीता के पावन जीवन को,
सत्य-धर्म का मान मिले।
शिव-धनुष केवल धनुष नहीं था,
बल का दंभ भी तौल रहा।
राम झुके, प्रत्यंचा साधी,
नव इतिहास भी बोल रहा।
शक्ति, विनय, दो कुल का संगम,
ये राम-विवाह के सार थे।
राम किसी एक हेतु न आए,
सृष्टि की संचित पुकार थे॥
दशरथ को जो शाप मिला था,
उसको भी फल पाना था।
पुत्र-वियोग की करुण घड़ी में,
वचन सत्य हो जाना था।
कैकेयी के वर ने खोला,
पथ जो वन तक जाता था।
राजमहल से धर्म निकलकर,
जन-जन तक पहुँच जाता था।
शाप, वचन और चौदह वर्ष,
ये धर्मयात्रा के द्वार थे।
राम किसी एक हेतु न आए,
सृष्टि की संचित पुकार थे॥
गंगा तट पर केवट जागा,
सेवा का वरदान मिला।
चरण पखारे, नाव चलाई,
निर्मल प्रेम को मान मिला।
भरत चले जब राम मनाने,
भाई का सम्मान बढ़ा।
पादुकाएँ सिंहासन पर थीं,
त्यागी का भी मान बढ़ा।
सेवा, त्याग और भ्रातृ-प्रेम,
ये रामकथा के सार थे।
राम किसी एक हेतु न आए,
सृष्टि की संचित पुकार थे॥
चित्रकूट से वन-पथ आगे,
आश्रम दीप जलाते थे।
अत्रि और सती अनसूया,
प्रभु को कंठ लगाते थे।
सुतीक्ष्ण के मन में दर्शन की,
बरसों से अभिलाषा थी।
शरभंग की अंतिम साँसों में,
राम-मिलन की आशा थी।
तप का फल, दर्शन की आकांक्षा,
सब अवतरण के आधार थे।
राम किसी एक हेतु न आए,
सृष्टि की संचित पुकार थे॥
दंडक वन की अस्थि-पंक्तियाँ,
मुनियों का भय कहती थीं।
राक्षस-दल की क्रूर कथाएँ,
सूनी आँखें सहती थीं।
राम उठे, तब धनुष सँभाला,
निर्बल का विश्वास जगा।
अगस्त्य ने दिव्यास्त्र दिए तो,
विजय-पथ का प्रकाश जगा।
तप की रक्षा, भय से मुक्ति,
ये निर्बल के अधिकार थे।
राम किसी एक हेतु न आए,
सृष्टि की संचित पुकार थे॥
पंचवटी में छल ने आकर,
सीता का अपहार किया।
जटायु ने नारी की खातिर,
प्राणों का बलिदान किया।
शबरी ने विश्वास सँजोकर,
वर्षों राह निहारी थी।
प्रेम भरे बेरों में उसने,
निष्काम भक्ति सँवारी थी।
बलिदान और सरल प्रतीक्षा,
ये दोनों भक्ति के शृंगार थे।
राम किसी एक हेतु न आए,
सृष्टि की संचित पुकार थे॥
ऋष्यमूक पर हनुमत बैठे,
अपने ध्येय से दूर रहे।
सुग्रीव न्याय को तरस रहे थे,
अन्यायों से चूर रहे।
राम मिले, हनुमत के बल को,
सेवा की पहचान मिली।
बाली-वध से पीड़ित जन को,
न्याय सहित फिर आन मिली।
सेवा, साहस, न्याय, समर्पण,
ये राम-मिलन के उपहार थे।
राम किसी एक हेतु न आए,
सृष्टि की संचित पुकार थे॥
वानर-दल की बिखरी शक्ति,
एक दिशा को पाना था।
सीता-खोज बनी वह धुरी,
सबको साथ मिलाना था।
संपाती ने दिशा बताई,
लंका का संकेत मिला।
अंगद ने नेतृत्व सँभाला,
दल को नव उत्साह मिला।
साथ चले तो सबके श्रम भी,
उस विजय-यज्ञ के भागीदार थे।
राम किसी एक हेतु न आए,
सृष्टि की संचित पुकार थे॥
जामवंत ने याद दिलाया,
हनुमत के बल जाग गए।
नाम राम का लेकर उछले,
दुर्गम बंधन टूट गए।
अशोकवाटिका में पहुँचे,
सीता का विश्वास जगा।
राम-मुद्रिका हाथ में आई,
आशा का फिर दीप जगा।
भूली शक्ति, जागा साहस,
ये दोनों मुक्ति के द्वार थे।
राम किसी एक हेतु न आए,
सृष्टि की संचित पुकार थे॥
विभीषण ने सत्य चुना तो,
धर्म निभाने आए थे।
शरणागत को मान मिला जब,
राम गले से लगाए थे।
सागर को भी सीख यही थी,
विनय-भाव समझाना था।
सेतु बना तो जग ने जाना,
असंभव को झुकाना था।
सेतु, शरण और सत्य की रक्षा,
ये लंका-विजय के द्वार थे।
राम किसी एक हेतु न आए,
सृष्टि की संचित पुकार थे॥
अंगद को जब दूत बनाया,
युद्ध रोकना चाहा था।
रावण ने हर राह ठुकराकर,
अपना अंत बुलाया था।
लक्ष्मण जब रण में मूर्छित थे,
हनुमत औषधि लाए थे।
राम-काज में छोटे-बड़े सब,
अपना धर्म निभाए थे।
राम-विजय में अनगिन सेवक,
उस धर्मयुद्ध के भागीदार थे।
राम किसी एक हेतु न आए,
सृष्टि की संचित पुकार थे॥
रावण के पास ज्ञान बहुत था,
पर मन में अभिमान रहा।
शक्ति मिली, पर धर्म न पाया,
इसीलिए अवसान रहा।
वध केवल इक देह का न था,
मद का भी संहार हुआ।
ज्ञान, शक्ति, वैभव से ऊपर,
मर्यादा का सार हुआ।
रावण अंत था, आरंभ नहीं,
उससे आगे कई उद्धार थे।
राम किसी एक हेतु न आए,
सृष्टि की संचित पुकार थे॥
चौदह वर्षों की तप-यात्रा,
लौट अवध में आना था।
सिंहासन को सेवा मानें,
ऐसा धर्म सिखाना था।
आज अगर पथ कठिन लगे तो,
वनवासों से घबराना मत।
देर लगे परिणाम मिले तो,
अपना विश्वास गिराना मत।
रामकथा के पात्र नहीं बस,
वे जीवन के संस्कार थे।
राम किसी एक हेतु न आए,
सृष्टि की संचित पुकार थे॥
— संतोष कुमार शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X