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शिवत्व भाग

                
                                                         
                            मेरे शिव, कहाँ हो?
                                                                 
                            
ढूँढ़ता हूँ आपको—
हर दिशा में, हर अंधकार और हर प्रकाश में।
हर नदी की कलकल में,
हर पर्वत की निस्तब्धता में।
हर जीव के तन में,
और मन की गहन कंदराओं में।

शायद
मेरे पुण्य कम पड़ गए हैं
जीवन की गणनाओं में,
या फिर मैं
अपने ही पापों का बोझ उठाए
एक चलता-फिरता शव बन गया हूँ।

कहाँ हो, मेरे शिव?
अपने होने का
एक संकेत,
एक स्पर्श,
एक प्रमाण ही दे दो।

वैराग्य की प्रतिमूर्ति,
प्रेम के साक्षात् स्वरूप,
कलियुग में भी
आप ही तो पालनहार कहलाते हो।

कहते हैं—
आप कण-कण में विराजते हो।
तो फिर
पाप और अधर्म को
इतना निर्भय क्यों होने देते हो?

जब प्रकृति विलाप करती है,
जब मानवता कराह उठती है,
जब निर्दोषों के आँसू
धरती को भिगोते हैं,
जब सम्मान लूटा जाता है,
जब मर्यादाएँ रौंदी जाती हैं,
जब असहाय की पुकार
आकाश चीर देती है—

तब,
हे नीलकंठ!
आप कहाँ चले जाते हो?

क्यों मेरे मन को
व्यथा के अथाह सागर में छोड़ देते हो?
क्यों मेरी निश्चल आस्था को
मौन की अग्नि में तपने देते हो?

हे मेरे शिव!

मैं तो आपकी
**चरण-रज** का भी अधिकारी नहीं,
फिर भी
स्वयं को आपका अनुगामी मानने का साहस करता हूँ।

मोह में बँधा हूँ,
माया से घिरा हूँ,
त्रुटियों से भरा हूँ,
किन्तु
आपकी ही रचना हूँ।

मन व्याकुल है—
और आप कहाँ हो?

हृदय टूटा हुआ है—
और आप कहाँ हो?

हे मेरे परमपिता!

मैं आपके दर्शन का
एक साधारण याचक हूँ।
मुझे कोई चमत्कार नहीं चाहिए,
न वैभव, न सिद्धियाँ।

बस—
एक संकेत दे दीजिए
कि मेरी पुकार
आप तक पहुँच रही है।

मैं तो केवल
आपकी प्रतीक्षा का पथिक हूँ,
आपके आगमन का परिचालक हूँ।

आप विश्वात्मा हो।
निर्गुण भी, सगुण भी।
रुद्र भी,
और करुणा के अथाह सागर भी।

आप कालभैरव हो,
महाकाल हो,
निराकार भी हो,
और समस्त सृष्टि का आधार भी।

किन्तु मेरे लिए—

आप न किसी ग्रंथ का श्लोक हो,
न किसी मंदिर की प्रतिमा।

आप तो
मेरी प्रत्येक श्वास में बसने वाले
मेरे अपने शिव हो।

मेरे आदि हो,
मेरे अंत हो।

मेरे मौन की भाषा हो,
मेरी प्रार्थनाओं का उत्तर हो।

आप ही मेरे भोलेनाथ हो,
आप ही मेरे प्रेम हो,
आप ही मेरे सत्य हो।

और जब तक यह प्राण चलेंगे,
मैं आपको खोजता रहूँगा—

हर धड़कन में,
हर आँसू में,
हर शून्य में,
हर "ॐ" की अनुगूँज में...

क्योंकि
यदि कहीं शिव हैं—

तो वही स्थान
मेरा वास्तविक घर है।
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3 महीने पहले

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