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तो 'रंग' मुस्कुराया शायद

                
                                                         
                            दिल को कोई भाया शायद
                                                                 
                            
कुछ ज़ेहन मुस्कुराया शायद
वो अपनी तरह से बोल सकूं
जो बोलता है साया शायद
मैं सच कहता हूं, ये सच है
मैं झूठ बोल पाया शायद
मैं गया था उसके घर लेकिन
फिर लौट के भी आया शायद
ये दुनिया, दुनिया ही तो है
तो ज़हर नहीं खाया शायद
बस मर जाने की जल्दी की
बस जी जाना भाया शायद
मैं उसे पुकारता आज भी हूं
वो मुझे बुला पाया शायद
ये दुनिया है, ऐसी ही है
क़ुदरत ने सितम ढाया शायद
कोई और ज़माना होता तो
तो 'रंग' मुस्कुराया शायद
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एक घंटा पहले

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