आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सेवा और समर्पण

                
                                                         
                            सेवा और समर्पण
                                                                 
                            

हनुमत सेवा में रत,
करते प्रभु का काम।
भरत विरह में तपते,
अधरों पर शुभ नाम।
एक निकट, एक दूर,
भक्ति समान निष्काम।
जिनसे स्पंदित जीवन—
दोनों के प्राण सियाराम॥

हनुमत सिंधु को लाँघें,
लेकर प्रभु का नाम।
भरत अवध को पालें,
कर पादुका-प्रणाम।
एक सँवारे वनपथ,
एक सँभाले प्रभु-धाम।
जिनकी आज्ञा जीवन—
दोनों के प्राण सियाराम॥

हनुमत शैल उठाएँ,
तन को कहाँ विश्राम।
भरत वल्कल में रहते,
नंदिग्राम बने तपधाम।
कष्ट सहें तन-मन के,
नहीं साधना का विराम।
जिनका सुख ही साध्य—
दोनों के प्राण सियाराम॥

हनुमत दर्शन पाकर,
करते साष्टांग प्रणाम।
भरत दर्शन को व्याकुल,
जपते प्रतिपल शुभ नाम।
मिलन मिले या विरह,
नहीं भक्ति का विराम।
जिनकी छवि ही संबल—
दोनों के प्राण सियाराम॥

हनुमत माँगें सेवा,
सेवा ही सुखधाम।
भरत चरणरज चाहें,
जपते पावन नाम।
न सेवा का प्रतिफल,
न समर्पण का दाम।
जिनमें सर्वस्व समर्पित—
दोनों के प्राण सियाराम॥
- संतोष कुमार शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर