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सपनों का अपराध

                
                                                         
                            रात-दिन एक करके
                                                                 
                            
जिन सपनों को
जागती आँखों से देखा था,
वे एक बार नहीं,
दो-दो बार टूटकर बिखर गए।

किताबों में सिर झुकाए
बच्चे भविष्य गढ़ रहे थे।
किसी ने नींद छोड़ी,
किसी ने आराम,
किसी ने घर की खुशियाँ,
बस एक सफेद कोट के सपने के लिए।

लेकिन एक झटके में
महीनों की मेहनत
एक खबर बनकर रह गई।
सवालों से पहले
संदेह बिक गया,
और जवाबों से पहले
विश्वास हार गया।

सपने बिखर गए,
ज़िंदगी सँवरने से पहले।
मौत जीत गई,
उम्मीदों के खिलने से पहले।

क्या गलती थी उन बच्चों की,
जिन्होंने डॉक्टर बनकर
दूसरों को जीवन देने का सपना देखा था?
आज वही अपने ही सपनों से हार गए,
और कुछ तो इस दुनिया से भी चले गए।

बस अब बंद करो
अपनी-अपनी सियासत।
इन मासूम सपनों पर
सत्ता का खेल मत खेलो।
थोड़ी-सी शर्म करो,
थोड़ी-सी इंसानियत बचा लो।
क्योंकि राजनीति फिर हो जाएगी,
लेकिन खोई हुई ज़िंदगियाँ
कभी लौटकर नहीं आएँगी।
-नीता श्रीवास्तव
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2 महीने पहले

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