धीरे धीरे रोज़ाना,
बिखरे बिखरे टुकड़े,
समेट समेट कर,
लगा रही हूँ,
दिल जैसा तो नहीं लग रहा,
पर कुछ तो बना रही हूँ।
लंबी लंबी रातें,
वक़्त से पहले,
महज़ सोते सोते,
गुज़ार रही हूँ,
के,
शायद आज,
सारे सारे ख़्वाब,
हम तुम्हारे साथ,
कहीं,
अनजानी राह पर,
हाथों में हाथ,
गुज़ार रहे हों।
लेकिन ये कुदरत,
सारे ही सपने,
तनहा तनहा दिखाती,
या,
यूँ ही,
तुम्हें सोचते सोचते,
सूरज की किरने,
भागी मिलने आ जाती।
उठते उठते जागने में,
टुकड़े फिर,
बिखर बिखर जाते,
हम फिर
कुछ,
दिल सा बनाते,
इसी बहाने,
की आज,
दे पाएँ तुम्हें,
मिल कर सपने में हमारे।।
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