पग-पग पर बिछे हैं पत्थर,
फिर भी बढ़ता जाता राहगीर।
सपनों की गठरी काँधे पर,
अपनी ही धुन में मस्त फ़कीर।
धूप तपे या गरजे बादल,
राह न अपनी बदलेगा।
पाँव में चाहे छाले हों,
मंज़िल पाए बिन न रुकेगा।
न छाँव की कोई आस रखे,
न ठहरने का कोई मोह यहाँ।
हर मोड़ पे एक नई कहानी,
चलना ही जिसका धर्म यहाँ।
मिट जाते हैं उसके नक़्शे-क़दम,
पर जज़्बा कभी न मिटता है।
अंधेरी रात के सीने पर,
वो उम्मीद बनके चमकता है।
ओ राही, तेरी यह यात्रा ही,
जीवन का असली मर्म है।
मंज़िल तो बस एक पड़ाव है,
चलते जाना ही तेरा कर्म है।
- (कानाराम मकवाना)
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