सर-सर सर-सर मत चल, भीनी-भीनी चल पुरवाई,
झीनी-झीनी बरसो बदली, हौले-हौले मस्ताई।
पात-पात पर मोती टाँके, ओस हँस-हँस मुस्काई,
फूलों की गलियों में ऋतु नव-अलकों-सी छाई।
कोयल मधुर तान छेड़ रही, अमराई हरसाई,
साँझ ढले पनघट की पगडंडी, चुपके-चुपके इतराई।
नदिया-तट पर चाँद उतरकर, रजनी-रास रचाई,
लहर-लहर ने बाँह पसारी, प्रीत-तरंग जगाई।
बेला, जूही, चंपा महके, सुरभि गगन में छाई,
भँवरे प्रेम-गीत गुनगुनाते, हर डाली शरमाई।
साँवरिया की याद जगाकर, पायल छन-छन आई,
विरह-वेदना भीगी चूनर, प्रीत-अगन सुलगाई।
मन-मंदिर में दीप जले तो, सुधि तेरी भर आई,
सपनों की नैया बह निकली, आशा-संग लहराई।
धरती ने हरियाली ओढ़ी, नभ ने छटा बिखराई,
प्रेम-सुधा ऐसी बरसी, जग की प्यास बुझाई।
मधुबन-मधुबन रास रचाता, मुरली मधुर बजाई,
राधा-मन की मौन व्यथा भी, मुस्कानों में समाई।
'भुवन' हृदय के भाव सजाकर, प्रेम-तान बिखराई,
सर-सर सर-सर मत चल, भीनी-भीनी चल पुरवाई॥
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