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पिता की पुरानी घड़ी

                
                                                         
                            पिता की पुरानी घड़ी
                                                                 
                            

पिता की घड़ी कलाई पर है,
हर टिक-टिक याद जगाती है।
वक़्त भले ही आगे बढ़ गया,
पर नज़र उन्हीं पर जाती है।

उनका स्पर्श बचा शीशे पर,
रूह उसे पहचान ही जाती है।
सूइयों का हर धीमा चक्कर,
सब्र का मतलब समझाती है।

मुश्किल जब भी सामने आए,
टिक-टिक हौसला बढ़ाती है।
पिता नहीं, पर घड़ी यहीं है,
हर पल साथ निभाती है।

कलाई पर जब बाँधूँ इसको,
एक गरमाहट भर जाती है।
घर से बाहर कदम बढ़ाऊँ,
छाया उनकी साथ निभाती है।

पुराना फीता घिसा हुआ है,
याद मगर निखर जाती है।
चाबी भरते हाथ काँपते,
आँख अचानक भर आती है।

दुनिया चाहे तेज़ चले पर,
यह उस दौर में ले जाती है।
पिता नहीं, पर घड़ी यहीं है,
हर पल साथ निभाती है।

सुख की कोई ख़बर मिले तो,
नज़र घड़ी पर टिक जाती है।
दुःख मन की देहरी छू ले,
टिक-टिक मरहम बन जाती है।

जितनी उम्र मेरी बढ़ती है,
उनकी कमी भी बढ़ जाती है।
माथे पर वह हाथ नहीं अब,
घड़ी दुआ-सी बन जाती है।

वक़्त बहुत कुछ छीन चुका है,
सीख कहाँ फिर मिट पाती है।
पिता नहीं, पर घड़ी यहीं है,
हर पल साथ निभाती है।
—संतोष कुमार शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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