मैंने प्रेम मे निस्वार्थ होकर खुदको ही त्याग दिया,
वो अपने स्वार्थ को प्रेम का नाम देते है
मैंने अपना घर छोड़ दिया
अपनों को छोड़ कर आ गयी
ये देह ये काया भी छोड़ दि,
अपने सपने अपनों को पीछे छोड़ आई
प्रेम मे अंधी सी हो गयी थी मै
जब विदाई का समय आया
आँख नम न हुई।
किंतु अब आई जो इस पिंजरे में
हर एक पल में मोतिया जैसे आँसू की धरा बहती रहती हैं
लिखूँ क्या
बोलू क्या किसके नहीं है हम
मै थिरक्ति रहती हु अक्सर अपने मायके की यादों में
कोई हाल तक नहीं पूछता है मेरी तन्हाई का
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