शाम के समय
अकेले रास्ते पर चलते-चलते
जब पीछे मुड़कर देखता हूँ,
तो दिखाई देती हैं
कुछ स्मृतियाँ, कुछ विस्मृतियाँ,
जो मेरे रास्ते में आकर
खड़ी हो जाती हैं।
दिखाई देती हैं
किसी बीते समय की
भूली हुई कुछ बातें,
और कुछ दर्द,
जो बार-बार मुझसे सवाल करते हैं,
सिर्फ़ सवाल करते हैं।
जवाब ढूँढ़ नहीं पाया मैं,
कभी ढूँढ़ पाऊँगा?
पता नहीं।
फिर चल पड़ता हूँ मैं,
शाम के समय
अकेले रास्ते पर।
चलता रहता हूँ,
चलता रहता हूँ,
अकेला-अकेला,
अकेला-अकेला।
पीछे मुड़कर देखता हूँ अगर,
तो सवाल मेरे पास आकर खड़े हो जाते हैं,
बीते हुए दिन,
फिर से मेरा रास्ता रोक लेते हैं।
जवाब आज भी पता नहीं।
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