आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ओ री मेरे गांव की सड़क

                
                                                         
                            ओ री मेरे गांव की सड़क
                                                                 
                            
मेरे बचपन से जवानी की महक

कहते हैं कि अपने बदल जाते हैं
जिंदगी के सफर में
लेकिन नहीं, तुम नहीं बदली
देखा है मैंने तुम्हें जब मैं पांच साल की थी
अब बीस की हूँ
लेकिन तुम नहीं बदली

जैसे मेंरे बचपन में थी उबड- खाबड़, टूटी-फुटी
तुम आज भी वैसी ही हो
बिलकुल नही बदली

गांव का स्कूल प्राथमिक से माध्यमिक हो गया
अब तो गांव की पंचायत का ताला भी खुल गया
गांव के सीनियर सीनियर सिटीजन हो गए
और हम ब्याह के लायक हो गए
लेकिन तुम नहीं बदली

कितने प्रयास किया हमारे नेताओं ने
लेकिन तुम मौसम थोड़ी हो जो बदल जाओगी
भाई हमारे गांव की सड़क हो
मेरे बचपन से जवानी की महक हो
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर