नीलाचल पर शंख बजे,
सागर चरण पखार रहा।
जगन्नाथ के बड़े नयन में,
सारा जग आकार रहा।
सुभद्रा-बलभद्र संग बैठे,
मन भक्ति से भर जाता है।
जय जगन्नाथ पुकारे जग,
जीवन धन्य हो जाता है॥
विश्ववसु वन में प्रतिदिन,
नीलमाधव को ध्याते थे।
फूल-फल और निर्मल मन से,
भक्ति के दीप जलाते थे।
राजा ने जब कथा सुनी,
मन में प्रण जग जाता है।
जय जगन्नाथ पुकारे जग,
जीवन धन्य हो जाता है॥
विद्यापति वन-वन भटके,
अंत में दर्शन पाए थे।
नीलमाधव की छवि लेकर,
मन-मंदिर में लाए थे।
राजा पहुँचे, रूप न पाया,
स्वप्न नया पथ दिखलाता है।
जय जगन्नाथ पुकारे जग,
जीवन धन्य हो जाता है॥
सागर से पावन काष्ठ मिला,
कितने हाथ थक जाते थे।
नाम जपा जब सबने मिलकर,
भारी काष्ठ उठा लाते थे।
बल के सारे दाँव चुके,
भक्ति से पथ खुल जाता है।
जय जगन्नाथ पुकारे जग,
जीवन धन्य हो जाता है॥
वृद्ध शिल्पी भीतर आए,
द्वार बंद करवाए थे।
जब राजा ने द्वार खुलाया,
रूप अधूरे पाए थे।
रूप अधूरा दिखता है पर,
प्रेम पूर्ण कर जाता है।
जय जगन्नाथ पुकारे जग,
जीवन धन्य हो जाता है॥
हाथ नहीं, फिर भी सबको,
अपने गले लगाते हैं।
पाँव नहीं, फिर भी रथ पर,
भक्तों के घर आते हैं।
बड़े नयन हर पीड़ा पढ़ते,
हर दुख दूर हो जाता है।
जय जगन्नाथ पुकारे जग,
जीवन धन्य हो जाता है॥
नीलचक्र नभ में चमके,
ध्वजा राह दिखलाती है।
सिंहद्वार से करुण पुकार,
हर दुखिया बुलाती है।
महाप्रसाद सभी को जोड़े,
भेद वहीं मिट जाता है।
जय जगन्नाथ पुकारे जग,
जीवन धन्य हो जाता है॥
आषाढ़ी बादल छाते हैं,
तीन बड़े रथ सज जाते हैं।
भाई-बहन संग जगन्नाथ,
भक्तों के बीच आ जाते हैं।
लाखों हाथ पकड़ते रस्सी,
जग इक रंग हो जाता है।
जय जगन्नाथ पुकारे जग,
जीवन धन्य हो जाता है॥
स्वर्ण झाड़ू लेकर राजा,
सेवक बन मुसकाते हैं।
गुंडिचा में सात दिवस रह,
बहुड़ा में घर आते हैं।
सेवा से ऊँचा पद क्या,
अहंकार मिट जाता है।
जय जगन्नाथ पुकारे जग,
जीवन धन्य हो जाता है॥
चैतन्य प्रेम-मगन नाचे,
आँसू फूल बन जाते थे।
सालबेग के सरल भजन,
जन-जन के मन भाते थे।
सच्चा प्रेम जहाँ जागे,
हर बंधन कट जाता है।
जय जगन्नाथ पुकारे जग,
जीवन धन्य हो जाता है॥
चार धाम में पुरी धाम,
पूरब का उजियारा है।
सेवा, समता और करुणा,
इस मंदिर की धारा है।
जग के नाथ सभी के हैं,
हर अंतर खिल जाता है।
जय जगन्नाथ पुकारे जग,
जीवन धन्य हो जाता है॥
— संतोष कुमार शर्मा
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