आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नज़र से मिलाकर नज़र देखता हूँ

                
                                                         
                            मुहब्बत का ऐसे असर देखता हूँ,
                                                                 
                            
नज़र से मिलाकर नज़र देखता हूँ।

बिना कुछ कहे बोल देती हैं सब कुछ,
तुम्हारी नज़र का हुनर देखता हूँ।

ख़यालों में मेरे वो सिमटी है ऐसे,
नहीं और कोई ख़बर देखता हूँ।

नज़र में बसा के ये तस्वीर तेरी,
तेरा हुस्न मैं रातभर देखता हूँ।

भटकना ज़माने में छोड़ा है मैंने,
तुम्हारी तरफ़ हर सफ़र देखता हूँ।

अँधेरा कभी घेर लेता है मुझको,
नज़र में तुम्हारी सहर देखता हूँ!

नहीं रंग फीका पड़े 'अब्र' उसका,
मुहब्बत का ऐसा चुनर देखता हूँ!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर