मुहब्बत का ऐसे असर देखता हूँ,
नज़र से मिलाकर नज़र देखता हूँ।
बिना कुछ कहे बोल देती हैं सब कुछ,
तुम्हारी नज़र का हुनर देखता हूँ।
ख़यालों में मेरे वो सिमटी है ऐसे,
नहीं और कोई ख़बर देखता हूँ।
नज़र में बसा के ये तस्वीर तेरी,
तेरा हुस्न मैं रातभर देखता हूँ।
भटकना ज़माने में छोड़ा है मैंने,
तुम्हारी तरफ़ हर सफ़र देखता हूँ।
अँधेरा कभी घेर लेता है मुझको,
नज़र में तुम्हारी सहर देखता हूँ!
नहीं रंग फीका पड़े 'अब्र' उसका,
मुहब्बत का ऐसा चुनर देखता हूँ!
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