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नई सदी के इस मेले में

                
                                                         
                            नई सदी के इस मेले में
                                                                 
                            
(समाज रिश्तों और कॉरपोरेट जीवन की आधुनिक विडंबना)

नीली स्क्रीनें जाग रही हैं,
चेहरे नींद छुपाते हैं।
पास-पास बैठे हैं लेकिन,
मैसेज से बतियाते हैं।
दिल की बात अधूरी रहती,
इमोजी प्यार जताते हैं।
नई सदी के इस मेले में,
लोग अकेले रह जाते हैं॥

सुबह मशीन हाज़िरी लेती,
सब समय पर आ जाते हैं।
बॉस कहे - हम एक परिवार,
सब सुनकर मुसकाते हैं।
एक ईमेल के आते ही,
कितने लोग हट जाते हैं।
नई सदी के इस मेले में,
लोग अकेले रह जाते हैं॥

रंगीन स्लाइडों के भीतर,
आँकड़े नाच दिखाते हैं।
मेहनत वाले पीछे रहते,
मीठे बोल वाले छा जाते हैं।
सच की फ़ाइल धूल सहे तो,
जुमले बोनस पाते हैं।
नई सदी के इस मेले में,
लोग अकेले रह जाते हैं॥

कुर्सी मिलते रंग बदलते,
अपने दूर सरक जाते हैं।
कल तक जिनको मित्र कहा था,
वे चेहरे बदल जाते हैं।
पहली मुश्किल सामने आते ही,
रिश्ते लॉग-आउट हो जाते हैं।
नई सदी के इस मेले में,
लोग अकेले रह जाते हैं॥

कॉफी टेबल, दो मोबाइल,
चुपचाप शाम बिताते हैं।
आँखों से आँखें कम मिलतीं,
फोटो दिल बहलाते हैं।
वादे स्क्रीन पर जन्में तो,
ब्लू टिक पर मर जाते हैं।
नई सदी के इस मेले में,
लोग अकेले रह जाते हैं॥

माँ चौखट पर राह निहारे,
बच्चे फ़ोन मिलाते हैं।
वीडियो पर चरण छूकर भी,
फिर "बिज़ी हूँ" बतलाते हैं।
दवा का डिब्बा पूछ रहा है,
क्या बच्चे घर आ पाते हैं?
नई सदी के इस मेले में,
लोग अकेले रह जाते हैं॥

वेतन आते ही बिल सारे,
दरवाज़े पर आ जाते हैं।
रोटी, कपड़ा, घर की खातिर,
सपने गिरवी जाते हैं।
अपनों खातिर छुट्टी माँगो,
टारगेट बीच में आते हैं।
नई सदी के इस मेले में,
लोग अकेले रह जाते हैं॥

शादी में कैमरे सौ-सौ,
सब चेहरे मुसकाते हैं।
कर्ज़ उठाकर भोज बड़े हों,
रिश्ते छोटे हो जाते हैं।
लाइक गिनते तस्वीरों पर,
अपने हाथ छुड़ाते हैं।
नई सदी के इस मेले में,
लोग अकेले रह जाते हैं॥

ऊँची गाड़ी, बड़ा मकाँ हो,
लोग सलाम बजाते हैं।
वक्त ज़रा-सा करवट बदले,
अपने नज़र चुराते हैं।
जेब भरी तो रिश्ते जागें,
खाली हो, सो जाते हैं।
नई सदी के इस मेले में,
लोग अकेले रह जाते हैं॥

आधी खबरें, पूरे झगड़े,
घर-घर आग लगाते हैं।
नाम धरम का लेते हैं पर,
इंसाँ भूल ही जाते हैं।
शोर बहुत है चौपालों में,
सच के स्वर दब जाते हैं।
नई सदी के इस मेले में,
लोग अकेले रह जाते हैं॥

फिर भी कोई हाथ बढ़ाकर,
गिरते जन को उठाता है।
बिना दिखावे भूख मिटाकर,
मानव धर्म निभाता है।
मन से मन जब जुड़ता है तो,
पत्थर तक पिघल जाता है।
नई सदी के इस मेले में,
इंसाँ फिर इंसाँ बन जाता है॥
— संतोष कुमार शर्मा
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
37 minutes ago

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