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नव सृष्टि के आधार बने कृष्ण

                
                                                         
                            नव सृष्टि के आधार बने कृष्ण
                                                                 
                            

धरती पाप से बोझिल होकर,
धर्म की ज्योति खो रही थी।
कंस-सरीखे क्रूर नरेशों से,
मानवता भी रो रही थी।

देवों ने कर जोड़ पुकारा,
फिर संतुलन लाना था।
टूट रहे जन-मन में फिर से,
नव विश्वास जगाना था।

पीड़ा, प्रार्थना और प्रतीक्षा,
सब कृष्णावतार के द्वार बने।
कृष्ण धरा पर धर्म जगाने,
नव सृष्टि के आधार बने॥

कारा में देवकी के नयन,
आठवीं आस सँजोते थे।
वसुदेव के धीर नयन भी,
मुक्ति की राह सँजोते थे।

मध्यरात्रि में कृष्ण पधारे,
कारा के द्वार खुलते गए।
यमुना ने जब चरण छुए तो,
जल भी राह बनाते गए।

कारा, यमुना, नंद का आँगन,
सब लीला के विस्तार बने।
कृष्ण धरा पर धर्म जगाने,
नव सृष्टि के आधार बने॥

कंस भविष्यवाणी से डरकर,
हर नवजात मिटाता था।
पूतना को गोकुल भेजा,
विष का जाल बिछाता था।

ममता ओढ़े उस छल का,
सच जग को दिखलाया था।
विष लेकर आई पूतना को,
मोक्ष स्वयं दिलाया था।

छल की हार, करुणा की जय,
दोनों जीवन-संस्कार बने।
कृष्ण धरा पर धर्म जगाने,
नव सृष्टि के आधार बने॥

यमुना का जल विष से काला,
जीवन पर संकट भारी था।
कालिय का विष और अहंकार,
हर लहर पर भारी था।

कृष्ण ने यमुना शुद्ध कराई,
विषधर का अभिमान झुका।
गोवर्धन कर पर धरते ही,
इंद्रदेव का मान झुका।

कालिय-दमन, गिरिधर लीला,
दोनों प्रकृति के रखवार बने।
कृष्ण धरा पर धर्म जगाने,
नव सृष्टि के आधार बने॥

राधा का निष्काम समर्पण,
प्रेम का अर्थ बताता था।
रास नहीं था देह-बंधन,
मन को मन से मिलाता था।

हर गोपी के मन में कान्हा,
फिर भी किसी के पास नहीं।
प्रेम जहाँ अधिकार न माँगे,
उससे सुंदर रास नहीं।

राधा, गोपी, रास और मुरली,
सब भक्ति के शृंगार बने।
कृष्ण धरा पर धर्म जगाने,
नव सृष्टि के आधार बने॥

कंस पिता को बंदी करके,
सिंहासन पर बैठा था।
छह नवजातों को मरवाकर,
भय का राज्य बसाता था।

वध प्रतिशोध नहीं था केवल,
जनता का उद्धार हुआ।
उग्रसेन को राज सौंपकर,
न्याय पुनः साकार हुआ।

टूटी कारा, मुक्त हुए जन,
सब न्याय-राज्य के द्वार बने।
कृष्ण धरा पर धर्म जगाने,
नव सृष्टि के आधार बने॥

सांदीपनि के आश्रम में,
राजकुमार भी शिष्य बने।
वेद, नीति, शस्त्र और विद्या,
जीवन के आदर्श बने।

गुरु-दक्षिणा पूर्ण हुई तो,
शिक्षा का सम्मान किया।
सुदामा संग भूमि पर बैठकर,
मित्र-भाव का मान किया।

गुरु, गुरुकुल, विद्या, सेवा,
सब जीवन के संस्कार बने।
कृष्ण धरा पर धर्म जगाने,
नव सृष्टि के आधार बने॥

कंस-वध का बदला लेने,
जरासंध ने जब ठाना था।
बार-बार मथुरा पर चढ़कर,
जन-जीवन मिटवाना था।

निर्दोषों को रण से बचाकर,
द्वारका का निर्माण किया।
रण से हटना हार नहीं था,
नीति ने जन-त्राण किया।

रणछोड़ कहे जाने पर भी,
वे जन-जीवन की पतवार बने।
कृष्ण धरा पर धर्म जगाने,
नव सृष्टि के आधार बने॥

राजाओं को बंदी करके,
जब जरासंध इतराता था।
धर्मराज के राजसूय का,
रास्ता भी रुक जाता था।

कृष्ण ने भीम को राह दिखाई,
मल्लयुद्ध में अंत हुआ।
बंदी राजा मुक्त हुए तो,
सत्ता-मद भी शांत हुआ।

भीम का बल, श्रीकृष्ण की नीति,
दोनों निर्बल के अधिकार बने।
कृष्ण धरा पर धर्म जगाने,
नव सृष्टि के आधार बने॥

रुक्मिणी का पत्र पुकारा,
मन ने कृष्ण-वर माँगा था।
अनचाहे बंधन से बचना,
उसका सच्चा आग्रह था।

नरकासुर की बंदी नारियाँ,
अपना मान गँवाती थीं।
कृष्ण ने मुक्त किया तो वे भी,
नव जीवन अपनाती थीं।

नारी की इच्छा और गरिमा,
दोनों उसके अधिकार बने।
कृष्ण धरा पर धर्म जगाने,
नव सृष्टि के आधार बने॥

मुट्ठी भर चावल लेकर,
सुदामा मिलने आया था।
फटा अंगोछा उसने अपना,
राजमहल में छिपाया था।

मित्र न धन से तौले जाएँ,
कृष्ण ने यह संदेश दिया।
बिन माँगे सब देकर उसको,
मित्र-भाव को मान दिया।

राजा और गरीब के रिश्ते,
वे सच्चे मन के तार बने।
कृष्ण धरा पर धर्म जगाने,
नव सृष्टि के आधार बने॥

खाण्डवप्रस्थ उजाड़ पड़ा था,
तभी इंद्रप्रस्थ बसाया था।
पांडव के पुरुषार्थ को कृष्ण ने,
सच्चा मार्ग दिखाया था।

राजसूय की अग्रपूजा में,
शिशुपाल ने अपमान किया।
सौ अपराधों की सीमा टूटी,
सुदर्शन ने संहार किया।

क्षमा और दंड, समय के संग,
दोनों न्याय के सार बने।
कृष्ण धरा पर धर्म जगाने,
नव सृष्टि के आधार बने॥

द्यूतसभा में मौन खड़े थे,
बड़े-बड़े बलवान सभी।
द्रौपदी ने कृष्ण पुकारे,
टूट गई हर आस तभी।

चीर बढ़ाकर लाज बचाई,
नारी का सम्मान रखा।
सभा के झुके विवेक पर,
धर्म का कठिन प्रश्न रखा।

द्रौपदी की टेर और रक्षा,
दोनों नारी की हुंकार बने।
कृष्ण धरा पर धर्म जगाने,
नव सृष्टि के आधार बने॥

शांति-दूत बन कृष्ण गए थे,
युद्ध टालना चाहा था।
पाँच गाँव की बात रखी थी,
अंतिम मार्ग सुझाया था।

दुर्योधन को अवसर देकर,
उसका हठ उजागर किया।
युद्ध स्वयं कृष्ण ने न चाहा,
हठ ने उसको जन्म दिया।

विनय, प्रयास और दृढ़ निर्णय,
सब नीति-धर्म के सार बने।
कृष्ण धरा पर धर्म जगाने,
नव सृष्टि के आधार बने॥

कुरुक्षेत्र में अर्जुन का मन,
मोह-जाल में डूब गया।
अपनों को सम्मुख देख धनुर्धर,
कर्तव्य-पथ भी भूल गया।

युद्ध नहीं, कर्तव्य जरूरी,
कृष्ण ने यह समझाया था।
देह नश्वर, आत्मा अमर है,
गीता-सार सुनाया था।

रथ, रण, गीता और कर्मयोग,
सब जीवन की पतवार बने।
कृष्ण धरा पर धर्म जगाने,
नव सृष्टि के आधार बने॥

शस्त्र बिना भी युद्धभूमि में,
धर्म-पक्ष के साथ रहे।
राज किसी से माँगा नहीं पर,
न्याय-विजय के साथ रहे।

कर्म करो, फल पर मत अटको,
यही अनोखा ज्ञान दिया।
प्रेम रखा, पर सत्य बचाने,
नीति-चक्र को थाम लिया।

प्रेम, नीति, साहस, वैराग्य,
सब युग-युग के संस्कार बने।
कृष्ण धरा पर धर्म जगाने,
नव सृष्टि के आधार बने॥

प्रभास तट पर देह छोड़ी पर,
गीता का स्वर मौन नहीं।
मुरली थमी, पर प्रेम न थमता,
कृष्ण कहीं भी दूर नहीं।

आज संबंध बिखरें तो भी,
मुरली प्रेम जगाती है।
जब अन्याय चुनौती देता,
गीता राह दिखाती है।

कृष्ण कथा के पात्र नहीं बस,
वे जीवन के सद्विचार बने।
कृष्ण धरा पर धर्म जगाने,
नव सृष्टि के आधार बने॥
— संतोष कुमार शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

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