नशा नर्क का द्वार ओ साथी.
उजड़े घर संसार ओ साथी.
कड़ी कमाई धुएं में उड़ती.
सांसों की तो डोर भी घुटती.
आने वाली नस्लों को तुम,
क्या दोगे उपहार ओ साथी..
हंसता खेलता घर छूटेगा.
रिश्तों का धागा टूटेगा.
अपनी भूलों से हम को तो,
खुद ही पाना पार ओ साथी...
आओ मिलकर अलख जगाऐं.
भटकों को फिर राह दिखाऐं.
नशा मुक्त हो युवा देश का,
कहता राजकुमार ओ साथी...
--- राज कुमार भारद्वाज
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