सच्चाई के डर से तू
कब तक भागता जाएगा?
कब तक तिरछी चाल चलेगा?
एक दिन तो मात खाएगा।
चेहरे पे नकाब लगाकर
कब तक मुंह को छुपाएगा?
दोहरी जिंदगी जीते-जीते
एक दिन तो थक जाएगा।
धोखे की बुनियाद पर
कब तक महल सजाएगा?
चमकेगा सच का सूरज जिस दिन
हर झूठ सामने आएगा।
विश्वासघात का मायाजाल
कब तक तू फैलाएगा?
कपट की यह बिसात भला
कब तक तू जीत पाएगा?
सब कुछ समझ के भी चुप हूँ
जिस दिन यह जान जाएगा,
श्वास तो चलती रहेंगी
पर दम तेरा घुट जाएगा।
-पायल शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X