आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मेरा सफेद रंग का पक्षी

                
                                                         
                            जिस नाम से तुम अपनी पत्नी को पुकारते थे—
                                                                 
                            
मैं भी कभी उसे ठीक उसी नाम से पुकारा करता था।

तुम्हारी पुकार में जितनी आत्मीयता थी,
मेरी अपनी आशाएँ, विश्वास और आकांक्षाएँ भी
उससे कुछ कम गहरी नहीं थीं।

फिर भी, अंतिम कूची का स्पर्श अधूरा ही रह गया;
जीवन अचानक ठहर गया,
और मेरी आत्मा का एक हिस्सा मुझसे छिन गया।

उसके बाद कई दिन, कई महीने बीत गए—
ब्रह्मपुत्र के प्रवाह में कितना जल बह गया,
और कामाख्या की नीलाचल पहाड़ियों की ढलानों पर
कितनी बारिश बरसकर गुज़र गई...
फिर भी, वह सफ़ेद पंछी—
जो कभी मेरे हरे-भरे हृदय में प्रेम बनकर बसा करता था
फिर कभी लौटकर नहीं आया।

हर शाम मुझे ऐसा लगता है...
जैसे-जैसे दिन बीतते जा रहे हैं,
वह उतना ही अनजाना होता जा रहा है।

जब समय धीरे-धीरे मुट्ठी से फिसलता जा रहा है—
क्या मेरा वह सफ़ेद पंछी
किसी दूर, बहुत दूर की दुनिया में उड़ गया है?

हे इंद्रदेव?
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर