उसूलों को रखा है,
तेरे ख्यालों को रखा है,
न जाने कितने सवालों को रखा है।
अगर मिले खुदा तो पूछ लेती,
इन बंधी हुई जंजीरों को तोड़ देती,
उड़ जाती मैं अपने इन पंखों से,
जिन्हें न जाने कितने समय से छिपाए रखा है।
उड़ती, गिरती, दुखों में कराहती,
पर मूक ना हो जाती,
बिखर ही तो जाते मेरे पंख,
पर वो सब कर पाती,
जब मैं अपने इन जंजीरों को तोड़ पाती।
— ज्योति मणि
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