जब मन नहीं करता
कुछ खाने का, कुछ कहने का, कुछ सुनने का।
सूर्यास्त के समय एक अजीब-सी तन्हाई महसूस होती है।
मन के उस कमरे में बस अकेलापन ही भटकता रहता है।
अब कुछ भी अच्छा नहीं लगता।
समय पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली लगता है।
पहले तो मैं ऐसा नहीं था!
अब समय के चक्र में सब कुछ खोया-सा लगता है,
हालाँकि जानता हूँ, कुछ भी खोया नहीं है।
सब कुछ भूल जाने का एहसास होता है,
हालाँकि जानता हूँ, कुछ भी भूला नहीं हूँ।
बस मन के उसी कमरे में अकेलापन भटकता रहता है,
सिर्फ़ अकेलापन।
इन चार दीवारों के बीच बस मैं हूँ;
यहाँ मुझे सिर्फ़ मैं ही मिलता हूँ।
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