"मुसाफ़िर"
मुसाफ़िर के रास्ते बदलते रहे,
वह हर मोड़ पर खुद को संभालता रहा।
मंज़िल का पता भले धुंधला था,
पर उम्मीद का दीपक जलाता रहा।
कभी धूप मिली, कभी छाँव मिली,
कभी अपनों ने साथ निभाया,
कभी अजनबी भी हमसफ़र बन गए,
तो कभी अपने ही पराए नज़र आए।
रास्ते बदलना हार नहीं होता,
कभी-कभी वही नई मंज़िल तक ले जाता है।
जो ठहर जाते हैं डर के कारण,
वे सफ़र का असली आनंद खो देते हैं।
चलते रहना ही जीवन का धर्म है,
हर ठोकर एक नया सबक देती है।
मंज़िल से ज़्यादा खूबसूरत तो वह सफ़र होता है,
जो इंसान को बेहतर, मज़बूत और संवेदनशील बना देता है।
मुसाफ़िर के रास्ते बदलते रहे,
मुक़द्दर में चलना था… चलते रहे।
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