आज ठहर कर, ज़िन्दगी के किसी मोड़ पर,
मैंने खुद का हाथ थाम लिया।
महफ़िलों से अलविदा लेकर,
तनहाई को एक नया नाम दिया।
जब आईने के सामने खड़ी हुई
तो एक अलग ही अक्स नज़र आया।
सवालों की लंबी कतार में मैंने
खुद को अकेला खड़ा पाया।
धीरे से मुस्करायी मैं खुद को यूं देख कर
क्यों खुद से ही अनजान हो गई थी।
बिना बात लोगों की भीड़ में
सबको खुश करने में खो गई थी।
अब जान रही हू खुद को
दूसरों की परवाह करना छोड़ दिया
खुद से जो की मुलाकात मैंने
लोगों से मिलना छोड़ दिया।
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