मैं बाहर ही भटकता रहा
जिसकी ख़ातिर मैं ज़माने में बहुत दूर गया,
वो मेरे भीतर था—मैं बाहर ही भटकता रहा।
बीज मुट्ठी में लिए खेत बदलता ही रहा,
मैं उसे बोता नहीं था—फ़सलें माँगता रहा।
चाबी हाथों में रही, द्वार भी अपना ही था,
मैं मगर रास्ता खुलने की दुआ करता रहा।
नाव अपनी थी, किनारा भी नज़र आता रहा,
मैं हवा के बदलने का इंतज़ार करता रहा।
पेड़ आँगन का मेरे धूप में झुकता ही रहा,
मैं कहीं और किसी छाँव को ढूँढ़ता रहा।
जिनके होने से मेरा घर था, उन्हें वक़्त न दिया,
मैं मकाँ ऊँचा बनाता रहा—घर छोटा होता रहा।
रिश्ते टूटे तो शिकायत थी कि बदले हैं सभी,
गाँठ मेरे मन में थी—मैं धागे बदलता रहा।
उम्र भर जिनसे शिकायत थी कि समझे ही नहीं,
मैं उन्हीं से अपने दिल की बात भी छुपाता रहा।
वक़्त मुट्ठी में था, अपनों को मगर दे न सका,
मैं घड़ी से ही हर इक पल का पता पूछता रहा।
प्यार चौखट पे मेरे चुपचाप बैठा ही रहा,
मैं उसे दुनिया की महफ़िल में तलाशता रहा।
ज़ख़्म कुछ मेरी ज़ुबाँ ने भी दिए थे अपनों को,
मैं हर इक चोट का इल्ज़ाम ज़माने को देता रहा।
दौलतें जोड़ते-जोड़ते घर भरता ही गया,
मैं भरा घर देखकर भी ख़ुद को खाली पाता रहा।
मंज़िलें सामने थीं, पाँव मेरे रोकता था डर,
मैं मगर राह की दुश्वारियाँ गिनता रहा।
दीप हाथों में था, फिर भी रात का शिकवा रहा,
मैं ही लौ ढाँपता रहा—रात को कोसता रहा।
कल सँवारूँगा, इसी सोच में आज जाता रहा,
ज़िंदगी सामने थी—मैं कल को सजाता रहा।
जीतने निकला था दुनिया को, यही धुन थी मेरी,
ख़ुद से हारता रहा—जीत का जश्न करता रहा।
रिश्तों को रखने के लिए, मुट्ठियाँ कसता रहा,
जिनको उड़ने देना था, उनको ही बाँधता रहा।
सीढ़ियाँ चढ़ता गया, ऊँचा बहुत होता गया,
जिनके कंधों से चढ़ा था—उनसे छोटा होता गया।
दौड़ में सबसे निकल जाना ही मंज़िल मान ली,
जब पलटकर घर को देखा—अपने पीछे छूट गए।
मौत ने आख़िर में खोला ज़िंदगी का ये हिसाब,
जो समेटा था यहीं छूटा—जो बाँटा, साथ था।
दुनिया बदलने की कोशिश में उम्र गुज़रती रही,
जिसको पहले बदलना था—उसे बचाता रहा।
— संतोष कुमार शर्मा
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