केवटी के शिखरों पर जब घनघोर घटाएँ घिरती हैं
तट की इन भूरी चट्टानों पर जलधारा आ गिरती है
मटमैला सा यह वेग प्रपात विरह की पीर जगाता है
कालिदास के मेघदूत सा कोई संदेश सुनाता है
गहरी खाई की गोद में यह पानी शोर मचाता है
मानो कोई यक्ष यहाँ पर प्रिय को ढूँढ न पाता है
बैठी हूँ मैं इन पाषाणों पर पाँवों को सहलाती हुई
दूर क्षितिज के इन बादलों से अपनी बात बताती हुई
हे पवन! हे मेघ! सुनो इस सूनेपन की आकुलता
इन प्रपातों की गूँज में कैसी लिपटी है चंचलता
कह देना उस मीत से जाकर—प्राण तुम्हारे जीवित हैं
इस केवटी की वादियों में, हम दोनों ही समर्पित हैं
- श्रेया सिंह चंदेल
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