सुबह नौ बजे
काम शुरू होना था।
नौ बजे संदेश आया—
“पहले एक छोटी-सी
मीटिंग होगी।”
सभी आ गए।
काम अपनी मेज़ पर
अकेला बैठा रहा।
अध्यक्ष ने कहा—
“आज की बैठक
बहुत संक्षिप्त रहेगी।”
फिर एक घंटे तक
उन्होंने समझाया
कि बैठक संक्षिप्त
क्यों रहनी चाहिए।
परदे पर
चालीस स्लाइड थीं।
पहली पर लिखा था—
“सोच बदलिए।”
बाक़ी उनतालीस में
पुरानी बातें थीं।
प्रबंधक ने पूछा—
“हम पीछे क्यों हैं?”
सबको उत्तर पता था।
पर उत्तर देने वाला
आगे नहीं रह पाता—
इसलिए कमरा
चुप रहा।
एक कर्मचारी बोला—
“समस्या योजना में है।”
अध्यक्ष ने कहा—
“हमें समाधान चाहिए।”
उसने समाधान बताया।
अध्यक्ष ने कहा—
“इतना नकारात्मक
मत सोचिए।”
वित्त बोला—
“बजट नहीं है।”
बिक्री बोली—
“उत्पाद तैयार नहीं है।”
मानव संसाधन ने कहा—
“हमें मिलकर
काम करना चाहिए।”
सभी प्रभावित हुए—
क्योंकि वाक्य का
कोई अर्थ नहीं था
और विरोध भी संभव नहीं था।
एक सलाहकार
दूर शहर से आया।
उसने हमारी बात
अंग्रेज़ी में दोहराई।
जिस सुझाव को हम
छह महीने से दे रहे थे—
वही अब
‘ग्लोबल मॉडल’ कहलाया।
सबने नोट्स बनाए—
अपनी बात पर नहीं,
उसकी फ़ीस पर
विश्वास किया।
अध्यक्ष ने पूछा—
“ज़िम्मेदारी कौन लेगा?”
सबने नीचे देखा।
किसी ने फ़ाइल खोली,
किसी ने पानी पिया,
किसी ने अचानक
मोबाइल देख लिया।
आख़िर ज़िम्मेदारी
उस व्यक्ति को मिली—
जो उस दिन
छुट्टी पर था।
लक्ष्य इतना ऊँचा था
कि कोई छू न सके।
समय इतना कम
कि कोई सोच न सके।
सफलता आई तो
नेतृत्व की दूरदृष्टि।
असफलता आई तो
टीम की कमी।
एक युवा ने पूछा—
“ग्राहक से भी
पूछ लेना चाहिए?”
कमरे में ऐसी ख़ामोशी छाई
जैसे उसने कंपनी बेचने का
प्रस्ताव रख दिया हो।
किसी ने कहा—
“पहले आंतरिक सहमति
बना लेते हैं।”
ग्राहक बाहर प्रतीक्षा करता रहा।
अंदर सभी तय करते रहे
कि ग्राहक को
क्या चाहिए।
दोपहर हुई।
समोसे आए।
सबसे कठिन प्रश्न
तुरंत हल हो गया—
हरी चटनी
किस ओर रखनी है।
फिर चर्चा हुई—
पिछली चर्चा पर
कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
कार्रवाई तय हुई—
अगली बैठक में
इस पर चर्चा होगी।
सचिव ने लिखा—
“बैठक अत्यंत
फलदायी रही।”
क्योंकि फल की प्लेट
पूरी खाली हो चुकी थी।
शाम को अध्यक्ष बोले—
“अब काम पर
ध्यान देना होगा।”
फिर तय किया गया—
काम पर ध्यान देने हेतु
कल विशेष बैठक होगी।
सभी चले गए।
मेज़ पर पड़ा काम
धीरे से उठा।
उसने फ़ाइल बंद की
और बोला—
“मीटिंग समाप्त हो जाए
तो मुझे भी बता देना।”
अगली सुबह फिर संदेश आया—
“कल की बैठक की सफलता पर
आज एक छोटी-सी
मीटिंग रखी गई है।”
काम मुसकराया—
अब वह समझ चुका था,
इस कार्यालय में
काम करने से अधिक ज़रूरी है
काम पर बात करना।
और सबसे सुरक्षित वही है—
जो हर बैठक में उपस्थित हो,
हर निर्णय से सहमत हो,
और काम पूरा न होने पर कहे—
“इस विषय में
एक और मीटिंग
ज़रूरी है॥”
— संतोष कुमार शर्मा
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