माना हालेवक्त कठिन है, टूटे सारे सपने है।
अंतर्मन की कौन सुने, गैरों से लगते अपने है।
छाया भ्रम का अंधेरा जीवन के सौदे नपने है,
गूढ़ हुई चिंता, मन मस्तिष्क लगे अब खटने है।
जाने कैसी नासाजी बेचैनी में तन पिसता है,
छुपा दर्द आंसुओं की चादर में अंधेरा टिकता है।
अंदाज सबका रूखा रूखा सा ये कैसा रिश्ता है,
सुनाऊं किसको दुखड़ा कोई मीत न दिखता है।
है ये कैसा समय क्या वक्त की कटारी है,
खुद की बेबसी ही लगती न गवारी है।
ये कैसी मनःस्थिति की अजीब सवारी है,
लगता हर एक कदम अत्यंत भारी है।
क्यों नहीं कोई मेरी सुनने को आते,
करते थे जो प्यार और विश्वास की बाते।
क्या करूं किससे कहूं, कुछ नहीं पता,
काटने को दौड़ता है दिन गुजरती नहीं राते।
सारा जमाना हंसता होगा मुझ पर शायद,
क्या बताऊं हालेदिल न कोई शरीक रहेगा।
लगता खुद को मिटा दूं अब यही ठीक रहेगा,
झूल जाऊंगा, न जब कोई मेरे समीप रहेगा।
बात करके देखो सुनेंगे सब अपने है,
समझेंगे तुमको कैसे तुमने माना हम गैर है।
माना रास्ता थोड़ी दूर कठिन ही सही कट जायेगा,
कदम बढ़ाओ हिम्मत दिखाओ ये तुम्हारे अपने पैर है।
हार न मानो लड़ो लड़ाई कठिनता एक अंगड़ाई है,
विवाद नहीं संवाद करो बस छोटी सी ठोकर खाई है।
बाहर निकलो देखो सूरज ने आशा की किरण बिछाई है,
जिसको तुम अंधेरा समझ रहे वो तो बस परछाई है।
हाथ उठाओ पैर चलाओ नजरों को दौड़ाओ तुम,
हर लम्हा कुछ कहता है ध्यान से कान लगाओ तुम।
सब अंग सुदृढ़ कितने बड़भागे हो खुद को बतलाओ तुम,
बिखरे हैं पर पास हैं सब, थोड़ी तो चाह दिखाओ तुम।
मनोचिकित्सक से मिलकर मन को मार्ग दिखाओ तुम,
हर एक चुनौती अवसर है इसका लाभ उठाओ तुम।
आओ मिलकर पार लगाए हाँथों से पतवार बनाओ तुम,
बिखरे हैं पर पास हैं सब, थोड़ी तो चाह दिखाओ तुम।
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