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मैं स्वयं को नहीं हारा

                
                                                         
                            कई रिश्ते बचाते-बचाते मैं ख़ुद से दूर हो जाता,
                                                                 
                            
ज़रा ख़ुद को बचाया तो मैं ख़ुदगर्ज कहलाता॥

मैंने हर चोट को बदले की वजह बनने नहीं दिया,
मेरी इस सादगी को सबने मेरा डर समझ लिया॥

उन्हें मेरी ज़रूरत थी, मुझे अपना बताते थे,
ज़रूरत खत्म होते ही मुझे दोषी बताते थे॥

मेरे अच्छे दिनों में हर कोई अपना दिखाई था,
बुरा वक़्त आया तो मेरी परछाईं भी पराई थी॥

मैं अपने हक़ की खातिर जब ज़रा खुलकर खड़ा हो गया,
जो कल तक अपना कहते थे, उन्हीं का मैं बुरा हो गया॥

जिन्हें कंधों पे रखकर मैं नई ऊँचाइयाँ लाया,
उन्हीं ने लौटकर मुझको मेरा कद भी समझाया॥

मैं जिनकी जीत में परदे के पीछे साथ देता था,
मेरी इक हार पर कोई कहाँ आवाज़ देता था॥

मेरी ख़ामोशियों में फैसले तैयार होते थे,
वो समझे बुझ गया हूँ मैं—यहाँ अंगार सोते थे॥

मैंने सच बोलकर कितने ही दरवाज़े गँवा डाले,
मगर भीतर के दरवाज़े हमेशा ही बचा डाले॥

बहुत आसान था हर झूठ पर बस मुस्कुरा देना,
मगर मुश्किल था अपनी आँख से नज़रें चुरा लेना॥

मुझे झुकना भी आता है, अगर रिश्ते बचाने हों,
मगर झुकता नहीं उस द्वार पर, जहाँ ईमान गँवाने हों॥

बुरे दिन ने मेरा हर साथ मुझसे छीन भी लिया,
उसी तन्हाई ने मुझको मेरा ही साथ दे दिया॥

मैं गिरकर उठ गया तो यह उन्हें मंज़ूर कब होगा,
जिन्हें विश्वास था मेरा सफ़र उस मोड़ तक होगा॥

‘संतोष’ मेरी हारों का अभी निर्णय नहीं करना,
कहानी चल रही है—अंत की जल्दी नहीं करना॥
— संतोष कुमार शर्मा
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 घंटे पहले

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