"मैं स्वार्थी हूँ "
जरूरत पड़ने पर ही, किसी के पास जाती हूँ।
बहुत चुभती है धूप, तभी आँखों पर पर्दा डालती हूँ।।
नहीं फर्क पड़ता है, कुँए में पानी ज्यादा है या कम।
प्यास लगने पर ही, मै खुदको पानी पिलाती हुं।।
"मैं स्वार्थी हूँ "
कई हाथों को भुलाना था, तभी मैने कई हाथों को थामा था।
कुछ नया पाना था, तभी बहुत कुछ भुलाना था।।
नहीं फर्क पड़ता है, किसके हाँथ और किसकी यादें थी।
स्वार्थ है? तो स्वार्थ ही सही, अब बस मुझे खुदको पाना है।।
"हां मैं स्वार्थी हूँ "
दूसरों को हर घड़ी गलत बताया, क्यूंकि खुदको सही जताना था।
पता नहीं सही था या गलत, या मैने सिर्फ कोई ख्वाब सजाया था।।
नहीं फर्क पड़ता है, कौन सही कौन गलत।
अब बस मुझे खुदके फैसले पर ऐतबार जताना था।।
"क्यूंकि हां, मैं स्वार्थी हूँ "
न कोई पूरा दोस्त बना, न सही से कोई दुश्मन है।
एक, दो, तीन, हर बार मेरा बेकसूर होना भी नामुमकिन है।।
खैर छोड़ो अब मुझे इन सब की आदत है।
ठहराव नहीं मुझमे,अकेला रहना ही मेरी किस्मत है।।
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