अभिमान हमें इस बात का है,
दिनकर की भूमि जन्म हुआ।
हूं सरल भी मैं और सौम्य भी मैं,
पर विपदा जब-जब आई है
चंडी का अवतार लिया।
चलती न्याय धर्म के पथ पर मैं,
है किया समर्पण खुद को मैं।
मैंने रजिया बन शासन है किया,
मैंने मैत्रेयी बन सन्यास लिया।
मैंने गार्गी बन चुनौती दिया,
भारती बन शास्त्रार्थ किया।
मैंने लोपा बन मंत्रो को रचा,
अहिल्या बन न्याय माता बनी।
दुर्गावती रूप साहस भी बनी,
रूद्रमा के अवतार में मैं,
शक्तिशाली भारतीय रानी बनी।
रणभूमि में लक्ष्मीबाई बनी,
अंग्रेजों का संहार किया।
अब कहो कहां से कम हूं मैं,
जो तुमने मुझको पृथक किया।
-नेहा राज
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X