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मैं एक माटी का घड़ा हूं

                
                                                         
                            मैं एक माटी का घड़ा हूं
                                                                 
                            

मैं एक माटी का घड़ा हूं जनाब,
मैं जगह जगह पियाऊ बनकर साथ निभाऊंगा,
माटी से बना हूं माटी में ही मिल जाऊंगा,
मुझे न बारिश का डर है,
न बहती हवाओं का,
न चुभती धूप का,
मेरी डोर माटी से बंधी है , साहब,
मेरा मनोभाव सब में शीतलता लाना है, फिर भी,
हो जाएं कोई गिले- शिकवे तो उसे अपनी शीतलता से,
तरो- ताज़ा बनाऊँगा!
-आकांक्षा गुप्ता
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2 महीने पहले

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