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महबूब खोता रहा

                
                                                         
                            तेरे जाने के बाद दिल को सहारा नहीं रहा,
                                                                 
                            
अब लौटकर आने का भी इशारा नहीं रहा।
तेरे जाने के बाद कई महबूब बनाए,
हर ग़ज़ल में नए चेहरे सजाए।
एक महबूब माँगा था, कई किरदार मिल गए,
जिसे हक़ीक़त में खोया, वो ग़ज़लों में मिल गए।
हर महबूब के जाने पर एक ग़ज़ल लिखता रहा,
दुनिया इसे इश्क़ समझी, मैं महबूब खोता रहा।
हर शेर में तुझे ढूँढ़ा, तेरा अक्स सजाता रहा,
जिसे लफ़्ज़ों में सजाया, उसी को खोता रहा।
अब कलम उठाऊँ भी तो अल्फ़ाज़ नहीं आते,
तेरे बाद किसी शेर में जज़्बात नहीं आते।
 
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एक घंटा पहले

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