सड़कें सूनी थीं, लेकिन भूख जाग रही थी। रोटी की तलाश में, हर राह भटक रही थी।
राजपथ पर भाषण गूँजे, चौपालों पर भूख खड़ी। शब्दों ने उत्सव मनाया, आँखों में थी रात पड़ी।
कंधे पर बच्चा सोया था, माथे पर धूप सवार। पीठ पर पूरा घर बाँधे, चलता था लाचार।
ताली भी थी, थाली भी थी, दीपों की उजली कतार। रोटी फिर भी प्रश्न बनी थी, मौन खड़ा हर परिवार।
मास्कों के बाज़ार सजे थे, दाम दवाओं के चढ़ते थे। कुछ लोग आँसू गिनते थे, कुछ मुनाफ़े बटोरते थे।
अस्पताल के द्वारों पर, आशाओं की भीड़ खड़ी। साँसों तक के मोल लगे थे, कैसी थी वह कठिन घड़ी।
सफ़ाईकर्मी झाड़ू लेकर, हर गली-सड़क पर डटे रहे। मृत्यु सामने खड़ी रही, फिर भी कर्तव्य पर अड़े रहे।
डॉक्टर, नर्स और सेवक भी, जीवन-ज्योति जलाते थे। अपने भय को पीकर भीतर, औरों को साँस दिलाते थे।
मंदिर, मस्जिद, गिरजा, गुरुद्वारे, सबके द्वार थे मौन पड़े। तब जाना—सेवा के आगे, सारे मत छोटे ही पड़े।
धन-दौलत सब धरी रह गई, साँसों का व्यापार चला। एक अदृश्य सूक्ष्म जीव ने, मानव का अभिमान छला।
राख उड़ी श्मशान-घाट से, रोता था हर एक किनार। अश्रु-भरी गंगा भी बोली— "कितना भारी है संसार!"
नदियों ने भी उस काल में, मानव का संताप सहा। बहते निर्जीव शरीरों ने, युग का मौन इतिहास कहा।
माँ की सूनी आँख पूछती— "बेटा, अब तू कब आए?" काल मौन था, उत्तर रोया, सपने सारे बहते जाएँ।
कंधों का वह साथ छिन गया, अंतिम स्पर्श भी दूर हुआ। जीते-जी जो अपने थे, बिछुड़ना भी मजबूर हुआ।
कुछ चेहरे परदों में बैठे, देते रहे उपदेश महान। जिनके हाथों में छाले थे, लिखते रहे वही इतिहास।
जिनको छोटा समझा जग ने, वे सबसे ऊँचे निकल पड़े। झाड़ू, दवा और सेवा लेकर, मृत्यु-द्वार पर अटल खड़े।
फिर भी कितने साधारण जन, असाधारण बन जाते थे। अपने हिस्से की रोटी देकर, भूख किसी की मिटाते थे।
नभ निर्मल था, नदियाँ स्वच्छ थीं, प्रकृति ने मुस्कान भरी। मानव अपने घर में ठहरा, धरती ने फिर साँसें भरी।
कोरोना केवल रोग नहीं था, आईना था इस समाज का। चेहरा किसका कैसा निकला, खुला लेखा हर राज का।
इतिहास यही दोहराएगा— सत्ता का वैभव क्षणिक रहा। सेवा, साहस और करुणा का दीप सदा अविचल रहा।
याद रखो— महामारियाँ केवल शरीर नहीं, मानवता की भी परीक्षा हैं। इतिहास घोषणाओं से नहीं, त्याग, करुणा और साहस से लिखा जाता है।
समय जब इस युग को पढ़ेगा, एक ही निर्णय देगा काल— मनुष्य वही कहलाया, जिसने मनुष्य को थामा हर हाल।
-भुवनेश्वर प्रसाद दीक्षित 'भुवन'
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