माँ के बाद घर
चूल्हे पर जब चाय चढ़े,
माँ की याद चली आती है।
मेज़ सजे हर रोज़ मगर,
खाली कुर्सी रुला जाती है।
अलमारी में साड़ी उसकी,
ख़ुशबू बनकर ठहर जाती है।
शाम ढले जब दीप जले,
लौ में सूरत दिख जाती है।
रात अचानक आँख खुले तो,
उसकी लोरी लौट आती है।
माँ के बिन घर चुप रहता है,
हर आहट माँ बन जाती है।
आँगन में तुलसी हँसती है,
छाँव मगर कम पड़ जाती है।
त्योहारों की भीड़ में अक्सर,
उसकी कमी नज़र आती है।
थाली में पकवान सजे हों,
भूख कहीं पर खो जाती है।
घर में कोई बात चले तो,
उसकी राय याद आती है।
दुःख जब दर पर दस्तक देता,
माँ की दुआ ढाल बन जाती है।
माँ के बिन घर चुप रहता है,
हर आहट माँ बन जाती है।
उसके ख़त जब हाथ लगें,
बीती दुनिया लौट आती है।
अक्षर-अक्षर प्यार भरा है,
आँख चुपचाप भर जाती है।
घर का हर उत्सव अधूरा,
हँसी होंठ पर थम जाती है।
माथे पर जब हाथ न हो तो,
जीत भी फीकी पड़ जाती है।
मंदिर में जब शीश झुकाऊँ,
माँ की सूरत याद आती है।
माँ के बिन घर चुप रहता है,
हर आहट माँ बन जाती है।
— संतोष कुमार शर्मा
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