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मायके की राह से गुज़रती हूँ

                
                                                         
                            माँ और मायका
                                                                 
                            

मायके में माँ हो तो,
मायका सचमुच घर लगता है;
वरना वही आँगन भी
कुछ सूना-सूना लगता है।

माँ के हाथों की रोटी की महक
आज भी मन के आँगन में बसी है।
एक कौर यादों का खाती हूँ,
तो बरसों पुरानी दोपहर हँस पड़ती है।

माँ और मायका—
दो ऐसे शब्द,
जिनका स्मरण भर
मन को बचपन की गलियों में ले जाता है।

वहीं संजोई हैं
अनगिनत स्मृतियाँ—
माता-पिता का स्नेह,
भाई-बहनों की नोकझोंक,
हँसी, शिकायतें
और मनुहार की बातें।

जब-जब रूठकर
बिना टिफ़िन लिए स्कूल चली जाती थी,
माँ चुपचाप
मेरा टिफ़िन लेकर पहुँच जाती थी।
उस टिफ़िन में केवल भोजन नहीं,
माँ का स्नेह भी होता था।

ससुराल से जब भी
मायके आती थी,
माँ बिना पूछे ही
मेरी पसंद के व्यंजन बना देती थी।

माँ का आँचल
सिर्फ़ छाया नहीं,
जीवन का सबसे सुरक्षित आसमान है।
जिसके सिर पर
माँ का स्नेह बना रहता है,
उसके जीवन में
हर मौसम फूल बनकर खिलता है।

आज भी जब
मायके की याद आती है,
सबसे पहले
माँ की मुस्कान ही
आँखों में उतर आती है।

आज भी जब
मायके की राह से गुज़रती हूँ,
आँगन तो वही मिलता है,
पर माँ की पुकार नहीं।
तब समझ आता है—
मायका केवल एक घर नहीं था,
वह तो माँ की धड़कनों से बसा
एक संसार था।
माँ चली जाए,
तो दीवारें रह जाती हैं,
पर घर का स्पंदन
उसके साथ ही चला जाता
-नीरजा वकील नीर
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एक घंटा पहले

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