हम लहज़ा बा-असर रखते हैं,
कम लफ्ज़ों में भी हुनर रखते है।
दिल में ख़ौफ़-ए-ख़ुदा हरदम,
ज़मीर-ए-बेदार रखते हैं।
परिन्दों-सी बुलंद उड़ान हैं,
मगर पैरों को ज़मीं पर रखते हैं।
आंखों में हया और दिल में शर्म रखते हैं,
किरदार को हम बुलंद रखते हैं।
खुदगर्ज़ लोगों से फासला,
अपनों को सर-ओ-चश्म रखते हैं
दिलों में समंदर-सी वुसअत है,
इरादों में नश्तर रखते हैं ।
अच्छे-अच्छों को आईना दिखाने का,
हम भी एक हुनर रखते हैं।
-रुखसार परवीन
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