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मुफ़लिसी की चादरों से तन ढका

                
                                                         
                            गर्दिशों के बादलों की ओट में,
                                                                 
                            
छुप गया किरदार मेरा खोट में।

चाल चलने में हुए माहिर सभी,
फँस गई है ज़िंदगी अब गोट में।

सहने की आदत मेरी जो गई,
दर्द कोई अब नहीं है चोट में।

क़द्र करता कौन अब जज़्बात का,
ख़्वाहिशें सिमटी हुई हैं नोट में।

मुफ़लिसी की चादरों से तन ढका,
हम भला कैसे मिलेंगे कोट में।

बस यही जमहूरियत है असर,
शक्तियाँ होती बहुत हैं वोट में।

एक सूनापन नज़र में 'अब्र' है,
ख़्वाब सारे मर गए विस्फोट में।


 
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3 घंटे पहले

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