मुस्कुरा उठते लब तेरे दीदार से
यूँ न नज़र फेरों अपने कदरदान से
तरशती हैं निगाहें तेरी झलक को
बन जा वो ख्वाब जो मुकम्मल हो
ढूंढे नज़रें तुझे हर ज़र्रे में
बसा है तू मेरी जिंदगी के हर लम्हें में
तेरे ख्वाबों के हंसीन मंज़र
दे जाते है मुझे सुकून
तुम्हें बिना पाए, बिना बताए, बिन जाने
कैसा हैं यह जुनून
तुझे चाहा मैंने दिल-ओ-जान से
पर किस्मत की लकीरों में न सज़ा सकी
तुझे न खबर, तेरी चाहत में
मैं खुद को भी भुला बैठी
जानती हूँ मेरी मोहबत का तुझ पे न कोई असर
फिर भी तरशती हूँ पाने को तेरी एक नज़र
ज़िंदगी के हर गुज़रते लम्हें के साथ
दिल में यह आश उठती है......
काश तू सच होता.....
काश तू सच होता............
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