देख विघ्न की काली छाया वीर नही घबराते है ,
बैठ भरोसे भाग्य,दुःखो को भोग नही पछताते है
बड़ी मुसीबत कितनी भी हो,किन्तु नही उकताते है
चंचल वन भीड़ो मे भी चंचलता नही दिखाते है
बुरे दिन भी बन गये अच्छे भले उनके लिए,
काल कभी वीरो को सपने मे भी नहीं सताते है।
काम करना है अभी जो आज ही करते है वो,
जो लिया है ठान ,फिर करने से ना डरते है वो,
मानते सबका कहा ,सबका कहा सुनते है वो,
किन्तु जो करना है उनको,पूर्व मे गुनते है वो
कर भला खुद,दुसरो काम मुँह कभी न देखते,
काम ऐसा कौन है ,जिसको न कर सकते है वो।
कभी समय को जो यू अपने,व्यर्थ मे नही गवाते है
करते हुए आज कल,जो यू दिन को नही बिताते है
करने से प्रयत्न जो अपने जी को नही चुराते है,
जहां काम की बात,वहाँ पर बातें नही बनाते है,
है ऐसा वह काम कौन जो उनके लिए सरल न हो
बनकर स्वयं नमूना,औरों को भी यही सिखाते है।
चढ़कर पर्वत के शिखरो पर,छु लेता है जो अंबर
और पार करता वह जंगल,जहां अंधेरा आठ पहर
उनके लिए नही है मुश्किल,सागर की भी उठी लहर
अग्नि नही भयभीत करे,जो फैली सभी दिशाओ भर
है नही ताक़त कोई ,जिससे अनुज भयभीत हो,
भूलकर भी वह नहीं, नाकाम होगा कहीं पर ।।
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