क़लम उठाया तो उसका जमाल लिखना पड़ा,
किताब-ए-ज़ीस्त में अब इक सवाल लिखना पड़ा।
ये दिल का हाल कहूँ या कहूँ उसे जादू,
वो सामने था तो सब बेमिसाल लिखना पड़ा।
कभी जो हिज्र की रातों में हम बिखर से गए,
तो अपने अश्कों से उसका विसाल लिखना पड़ा।
वो जिसकी आँख में बसती थी एक नई दुनिया,
उसी की याद में अब माह-ओ-साल लिखना पड़ा।
नज़र के तीर तो सीने से पार उतरे थे,
सो अपने ज़ख्मों को अब ख़ुश-ख़िसाल लिखना पड़ा।
फ़िज़ा में उसकी ख़ुशबू का तज़किरा छेड़ा,
तो फिर हवाओं को रश्क-ए-कमाल लिखना पड़ा।
वो बेख़बर है कि उसकी अदा ने क्या-क्या है,
हमें तो ख़ुद को ही हरफ़-ए-ज़वाल लिखना पड़ा।
न पूछो कैसे गुज़ारी है ज़िंदगी हमने,
हर इक ख़ुशी के एवज़ अब मलाल लिखना पड़ा।
फ़याज़़ बस यही हासिल रहा है इस दिल का,
मोहब्बतों में हमें ख़ुद को ढाल लिखना पड़ा।
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