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कलम की जंग

                
                                                         
                            जंग है ज़ेहन और कलम में
                                                                 
                            
ये कोई तमाशा थोड़े ही है

कई दिनों से कुछ लिखने को हूँ परेशान मैं,
ज़ेहन कहता है,तेरा आशियाँ फौलाद थोड़े ही है

खोल दूँ हर पेंच-ओ-खम,हर राज़ ए निहाँ,
सच से कोई अंजान थोड़े ही है

जीत कर आना, ऐ मेरे वतन के बहादुरों
दुआ है मेरी,महज़ अल्फ़ाज़ थोड़े ही है

बदलाव की जो आहट है,उसे सुनिये,
ये कोई मामूली सैलाब थोड़े ही है

जग गया है अब ये कारवां, ऐ दोस्त,
मगर हर शख्स अभी बेदार थोड़े ही है

लब तो सबके सलामत हैं यहां
कोई बेज़ुबान थोड़े ही है

'रुखसार'सच की राह में चलना आसान कहां
हर मोड़ फूलों का गुलजार थोड़े ही है।
-रुखसार परवीन
 
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3 महीने पहले

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