जीवन कोई फूलों की सेज नहीं, काँटों का विस्तृत बाज़ार है। चेहरों पर मुस्कानों का मेला, भीतर हर मन बीमार है।
रास्ते ऊँचे, राहें टेढ़ी, हर मोड़ नया व्यापार मिले। सच बोलो तो पत्थर मिलते, झूठ कहो तो सत्कार मिले।
राही लाखों मिलते जग में, पर साथी कितने होते हैं? जो कंधों पर हाथ धरते थे, विपदा में मुख मोड़ते हैं।
भोलों को सब मूर्ख समझते, चालाकों का सम्मान यहाँ। डाकुओं से गहरी यारी, सज्जन का अपमान यहाँ।
कल तक जिनको चोर कहा था, आज वही सरताज बने। सच की चौखट सूनी दिखती, झूठ सभी का ताज बने।
ईमानों की बोली सस्ती, झूठ बिके बाज़ारों में। सत्य अकेला रोता दिखता, छल बैठे दरबारों में।
रिश्तों का भी मोल लगाया, स्वार्थ हुआ पहचान यहाँ। दौलत के आगे झुकता देखा, बिकता हर ईमान यहाँ।
चलना है तो आँखें खोलो, हर चेहरा भगवान नहीं। हर मुस्कान विश्वास नहीं, हर रिश्ता वरदान नहीं।
मंज़िल उनको ही मिलती है, जो सत्य-पथ अपनाते हैं। झूठ के ऊँचे महलों वाले, अक्सर भीतर ढह जाते हैं।
-भुवनेश्वर प्रसाद दीक्षित 'भुवन'
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