दिन के एक पहर में
जो न होना था, वही हो गया।
जल्दबाज़ी की अंधी रफ़्तार में
माँ-बाप का लाल खो गया।
नाज़ों से जिसे पाला-पोसा,
कई जतनों से बड़ा किया,
अपनी एक-एक साँस देकर
उस पौधे को हरा किया।
किलकारी से जिसकी कभी गूँजता था आँगन,
आज वही स्वर कहीं हवाओं में गुम हो गया।
जल्दबाज़ी की अंधी रफ़्तार में
माँ-बाप का लाल खो गया।
जिसकी एक खरोंच पर
माँ का दिल अटक जाता था,
उसके हँसने भर से
उनका सुकून लौट आता था।
उनके कानों ने अपने बेटे को शव कहते कैसे सुना होगा
जो बनकर सैनिक
सीमा पर तिरंगे की शान बढ़ाता,
या सफ़ेद कोट पहन
किसी की साँसों का रखवाला बन जाता।
बातों बातों में मां-बाप से बुढ़ापे का सहारा बनने का जिक्र भी किया होगा
आज उसी का अंतिम सहारा उसके पिता का काँधा हो गया
देखो...
माँ-बाप का लाल खो गया।
अग्नि उसे सहला देना,
अपने सीने से लगा लेना।
उसके तेज़ की चमक
अपनी ज्वालाओं में सजा लेना।
हे वसुंधरा,
उसे तू अपने आँचल में जगह देना।
माँ बिन उसका मन न लगे तो,
थोड़े लाड़ भी लड़ा लेना ।
अश्रु मेरे अनवरत बह रहे हैं,
उसकी जननी का कितना हाल बुरा होगा ?
जल्दबाज़ी की अंधी रफ़्तार में
जिसका लाल खो गया।
जागो प्रशासन,
अब तो अपनी आँखें खोलो।
किसी की आँखों का तारा
आज आसमान का तारा हो गया।
जल्दबाज़ी की अंधी रफ़्तार में
माँ-बाप का लाल खो गया।
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