जब प्रेम शिव से है
तो वैराग्य क्या संसार क्या
बहिष्कार क्या स्वीकार क्या
संघर्ष क्या आराम क्या
चिता क्या चिंतन क्या
रुदन क्या हास्य क्या
जो रम के ना मिल पाया
उसका विलाप क्या
जब सब शिव से जुड़ गया
तो पश्चाताप क्या व्यवहार क्या
तुममें होकर जाना जब जग को
जग में लगा अब कुछ नहीं है
सब तेरे चक्कर काट रहे
और आप सबके चक्र काट रहे
लोग पूजते मंदिर और शिवालों में
और आप घर में माता - पिता के चरणों में विराज रहे
अब लगता है मन छूट जाये सबसे
अगर आप स्वीकार हो
मन तृष्णा की मिट जाएं
चाहे अंत आपके हाथ हो
क्योंकि
अंत का विकल्प हो
या आरंभ का विचार हो
जगत में विचरते हम
जिनका अंतिम संस्कार आप हो
तो अगर आप साथ हो
तो परम क्या विकार क्या
जब अंत और आदि
तो सब जीवन और वरदान क्या
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