जब पंचमुखी बने हनुमान
रात अँधेरी, रण सोया था,
माया का जाल बिछाया।
अहिरावण ने छल से आकर,
राम-लखन को पाताल पहुँचाया।
लंका में जब भेद खुल पाया,
हनुमत ने प्रण फिर दोहराया।
पाँच मुखों में तेज समाया,
पंचमुखी बन धर्म बचाया॥
द्वार खड़ा मकरध्वज बोला,
“मैं भी वीर महान।”
पुत्र मिला, पर धर्म प्रथम था,
हनुमत का दृढ़ विधान।
उसे बाँधकर मार्ग बनाया,
पाताल का फिर भेद भी पाया।
पाँच मुखों में तेज समाया,
पंचमुखी बन धर्म बचाया॥
पाँच दिशाओं में दीपक जलते,
जीवन उनमें कैद रहा।
एक बुझा तो दूजा जलता,
इसीलिए वह अजेय रहा।
भेद कठिन जब सामने आया,
हनुमत ने संकल्प जगाया।
पाँच मुखों में तेज समाया,
पंचमुखी बन धर्म बचाया॥
पूरब में हनुमत मुख दमका,
साहस का संचार हुआ।
दक्षिण नरसिंह जाग उठे तो,
भय का अंत तत्काल हुआ।
एक ने साहस खूब बढ़ाया,
दूजे ने हर भय मिटाया।
पाँच मुखों में तेज समाया,
पंचमुखी बन धर्म बचाया॥
पश्चिम गरुड़ मुख जागा,
विष का टूटा सारा मान।
उत्तर में वराह मुख दमका,
स्थिरता की दी पहचान।
ऊपर हयग्रीव मुख जागा,
ज्ञान का दीप जलाया।
पाँच मुखों में तेज समाया,
पंचमुखी बन धर्म बचाया॥
पाँचों मुख ने पाँच दिशाओं में,
एक साथ हुंकार भरी।
पाँचों दीप बुझे तो टूटी,
माया सारी गई बिखरी।
अहिरावण का अंत कराया,
राम-लखन को मुक्त कराया।
पाँच मुखों में तेज समाया,
पंचमुखी बन धर्म बचाया॥
राहें कई, मन एक अकेला,
कैसे चुने सही अभियान?
लोभ, भय, भ्रम, क्रोध, निराशा,
रोक रहे उसकी उड़ान।
साहस, धीरज, ज्ञान जगाया,
युवा ने अपना लक्ष्य भी पाया।
पाँच मुखों में तेज समाया,
पंचमुखी बन धर्म बचाया॥
एक मुख साहस, एक सुरक्षा,
एक विवेक महान।
एक है सेवा, एक है संयम,
पाँचों से युवा बलवान।
पाँच गुणों को साथ जो लाया,
उसने अपना कल चमकाया।
पाँच मुखों में तेज समाया,
पंचमुखी बन धर्म बचाया॥
जब संकट की रात घनेरी,
मन में रखना एक ही ध्यान।
रूप बदलकर राह बनाता,
जिसका लक्ष्य रहे महान।
हनुमत ने यह मंत्र सिखाया,
बदल स्वयं, पर धर्म निभाया।
पाँच मुखों में तेज समाया,
पंचमुखी बन धर्म बचाया॥
— संतोष कुमार शर्मा
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