इश्क़ इम्तिहां लेता है मान लीजिये,
दिल टूटता है अक्शर जान लीजिये l
ख्वाब अपने होते हैं ऐसा सोचते थे जो,
वो खैरात समझते है जिसे पहचान लीजिये l
दर्द होता है, चुभन भी होती है,
अक्श आँखों मे और जलन भी होती है,
मधु टपकता है जिन अधरों से,
जहर भी होता है एहसास कीजिये l
मौत मरकर भी मुकम्मल हो जाए,
समझो जन्नत का सफर पार हो जाए l
हूर नूर लिए बैठी है मत सोचिये जनाब,
कत्ल किरदार का हो जाता है जान लीजिये l
वो तसब्बुर्, तकल्लुफ़ मे बदल जाता है,
जब अल्फाज जज्बात मे खो जाता है l
मयकदा, मसवरा सा देने लगे जब,
समझिये ये जिंदगी बर्बाद हुई है l
हम मोहब्बत को आजमाने चले जिस गली,
उस गली को मौत कब की नीलाम करी है l
दो जिश्म इक जान का वादा करी थी जो,
आज जन्नत से जहन्नुम तक वो ला चुकी है l
टूटता है बदन, दिल तो अब धड़कता भी नहीं,
मैकशी को ऐसे वो बदनाम करी है l
हम तबस्सुम को निगेहबां में सजाने चले थे,
वो कहकहे में मेरे दिल को नीलाम करी है l
हम पीते रहे जिस्म से हर खून का कतरा निकालकर,
वो पिलाते रहे हमको सज सवारकर l
ठोकर थी खाई जैसे कोई पत्थर हो राह मे,
हम खाई मे गिरे, गिर पड़े , गिर ही गए हैं l
उस अक्स को हम अश्क मे अब ढूंढ रहे है,
जिस शख्स से हम रश्क की उम्मीद किये हैं l
-प्रियांशु पांडेय
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