आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

हॉस्टल की पहली रात

                
                                                         
                            खाली कमरा,
                                                                 
                            
चारों ओर सन्नाटे का पर्दा।
मन में एक अजीब सी बेचैनी,
घर की याद,
पेट में माँ के हाथ के खाने की भूख।
आगे सपनों का सफ़र,
पीछे छूटता बचपन।
मानो वो रात
दोनों के बीच कहीं ठहर गई हो।
पंखे की आवाज़ भी
घर की याद दिला रही थी।
हर चीज़ नई थी,
बस यादें पुरानी थीं।
एक बिस्तर पर तन था,
मगर मन अब भीघर के उसी कमरे में भटक रहा था,
जहाँ बचपन ने आँखें खोली थीं।
उस एक कमरे में
बचपन की यादें
और जवानी के सपने
साथ-साथ चल रहे थे।
आँखों में हल्का सा डर था,
दिल में हज़ार उम्मीदें।
शायद हर सपने की शुरुआत
ऐसी ही किसी रात से होती है।
सुबह जब आँख खुली,
कमरा वही था...
बस एक रात में
घर थोड़ा और पीछे रह गया था।

 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर