खाली कमरा,
चारों ओर सन्नाटे का पर्दा।
मन में एक अजीब सी बेचैनी,
घर की याद,
पेट में माँ के हाथ के खाने की भूख।
आगे सपनों का सफ़र,
पीछे छूटता बचपन।
मानो वो रात
दोनों के बीच कहीं ठहर गई हो।
पंखे की आवाज़ भी
घर की याद दिला रही थी।
हर चीज़ नई थी,
बस यादें पुरानी थीं।
एक बिस्तर पर तन था,
मगर मन अब भीघर के उसी कमरे में भटक रहा था,
जहाँ बचपन ने आँखें खोली थीं।
उस एक कमरे में
बचपन की यादें
और जवानी के सपने
साथ-साथ चल रहे थे।
आँखों में हल्का सा डर था,
दिल में हज़ार उम्मीदें।
शायद हर सपने की शुरुआत
ऐसी ही किसी रात से होती है।
सुबह जब आँख खुली,
कमरा वही था...
बस एक रात में
घर थोड़ा और पीछे रह गया था।
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